चालीस साल बाद अपने जन्मस्थान झाँसी आया हूँ...जहाँ
मैंने जीवन के शुरुआती दस साल बिताए।
इस ट्रिप के लिए मन में इच्छा बहुत समय से थी बस प्लान बन ही नहीं पा रहा था। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर झाँसी की एक रील देखकर आँखें खुद ब खुद नम हो गईं।
पत्नी ने देख लिया, और बोली, "अब इस ट्रिप पर हो ही आओ जिसका ख़्वाब इतने सालों से देख रहे हो।"
मैंने कहा, "तुम
भी चलो।" क्योंकि शादी के 23 सालों
में हर ट्रिप पर वो मेरे साथ गई है।
वो बोली, "नहीं!
ये ट्रिप तुम अकेले एन्जॉय करके आओ।"
अब लगता है वो सही थी। इस जगह से जो गहरा भावनात्मक जुड़ाव मेरा है वो शायद ही मेरे परिवार में किसी और का होगा।
तो उसी समय साथ चाय पीते-पीते ट्रेन की टिकट बुक कर दी और होटल भी चुन कर फाइनल कर दिया।
उसके बाद से तो एक-एक दिन मानो एक-एक साल का लग रहा था।
पत्नी रोज पूछती, "कैसा
लग रहा है", मैं
कहता, "अब
रहा नहीं जा रहा, मन
कर रहा है उड़ कर पहुँच जाऊँ झाँसी।"
खैर, होते
होते वो दिन आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था।
स्टेशन
पहुँचा, ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी हुई थी। मैंने अपना कूपा ढूंढा और ट्रेन में चढ़ते
समय मानो कदम एक पल के लिए रुक सा गए, शायद ये सोचकर कि क्या ये सच में हो रहा है।
उस
पल दिल एक छोटे बच्चे की तरह ख़ुशी महसूस कर रहा था और न चाहते हुए भी पता नहीं क्यों
आँखें फिर से नम हो गईं। इतना ज्यादा इमोशनल शायद ही लाइफ में कभी हुआ हूँगा मैं!
खैर, अपनी सीट ढूंढी और सामान सेट करके बैठ गया।
पर मानो दिल अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहा था कि ये सच में हो रहा था।
आख़िरकार
तयशुदा टाइम पर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी तब विश्वास हुआ कि ये सच है...
मैं
सच में झांसी जा रहा हूँ, वो भी 40 सालों बाद।
मारे
खुशी के सारी रात करवटें पलटते बिताई, रह-रह कर घड़ी में टाइम चेक करता रहा। तड़के
सुबह सही समय पर गाड़ी अपने गंतव्य पर पहुँच गई।
मैं प्लेटफॉर्म पर उतरा। दो मिनट रुककर इस नज़ारे को मानो खुद में समाने की कोशिश कर रहा था।
इस सच्चाई को और महसूस करने के लिए प्लेटफॉर्म की चाय की दुकान से एक चाय ले ली। कुछ मिनट और उस स्टेशन को महसूस करने के मिल गए।
चाय
की चुस्कियाँ लेते हुए मैं बचपन की यादों में चला गया। ना जाने कितनी देर उन सुहाने
पलों में खोया रहा।
चाय खत्म हुई, मैं अपना सामान उठाकर धीरे धीरे स्टेशन से बाहर निकला तो पाया हर तरफ़ ज़मीन गीली है। शायद कुछ देर पहले बारिश होकर चुकी थी।
ऑटो की लाइन में से एक ऑटो लेकर होटल
पहुँचा और चेक इन कर लिया।
बेड
पर लेटते हुए एक हल्की सी मुस्कान मेरे चेहरे पर थी कि हाँ… मैं फाइनली झाँसी में हूँ।
पहले
दिन की शुरुआत मैंने क्रिश्चियन हॉस्पिटल से की, जहाँ 50 साल पहले मेरा जन्म हुआ था।
मैंने
आज से पहले इस हॉस्पिटल का नाम सिर्फ़ माँ के मुंह से सुना था कि मैं यहाँ पैदा हुआ
था।
मैंने याद के लिए कुछ फोटो खींची और अपने मोहल्ले की तरफ़ जाने वाली रोड पर तेज़ कदमों से बढ़ चला, जहाँ मेरा बचपन बीता था।
कुछ पुराने माइलस्टोन जैसे ‘बर्फखाना’ जो रोड के बाएँ हाथ पर कोने में हुआ करता था अब वहाँ से नदारद था। उसकी जगह एक बिजी कमर्शियल कॉम्प्लेक्स ने ले ली थी।
मैं कुछ देर सड़क के किनारे खड़े होकर उस कॉम्प्लेक्स को देखता रहा और सोच रहा था इस भीड़ में अब कुछ ही लोगों को उस बर्फखाने की याद होगी!
शायद समय का यही दस्तूर है, कि जो चीज़ एक समय पर उस जगह की पहचान हुआ करती थी समय के साथ धीरे-धीरे नैपथ्य में गुम हो जाती है।
आगे
बढ़ा तो याद आया यहीं सीधे हाथ को जहां से रोड मुड़ती थी, मेरा प्री-प्राइमरी स्कूल
हुआ करता था। ढूँढने की कोशिश की पर उसका कोई निशान नहीं मिला।
स्कूल के अब ना होने की बात सुनकर थोड़ा दुख हुआ पर खुद को समझाया कि इतने साल भी तो हो गए।
इन्हीं विचारों के साथ आगे बढ़ रहा था कि सीधे हाथ को एक डेयरी शॉप पर नजर पड़ी जो जानी-पहचानी सी लगी।
इधर-उधर
देखा और दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि हमारे यहां इसी डेयरी से दूध आता था। अपने बचपन के पहले निशान को सामने पाकर खुद को रोक ना सका और सीधे दुकान के मालिक
के पास पहुंच गया।
"क्या
चाहिए साब।" उसके चेहरे पर वो गर्मजोशी से भरी मुस्कान और ज़ुबान में वही छोटे शहर
की मिठास और अपनापन पाकर मन बेहद खुश हुआ।
अब
यही अगर दिल्ली जैसे बड़े शहर में होता तो दुकान मालिक से एक ठंडा सा रिएक्शन मिलता
और चेहरे पर ‘तुम-मेरा-समय-खराब-कर-रहे-हो’ वाला एक्सप्रेशन होता।
पर
ये तो मेरा प्यारा झाँसी था।
"अरे
वाह! आप इतने साल बाद सिर्फ अपने शहर को देखने आए हैं? कमाल की बात है।" दुकान मालिक
बोला। वो सच में एक्साइटेड दिख रहा था और मुझे ऊपर से नीचे ऐसे देख रहा था मानो मैं
कोई अजूबा हूँ।
बातों
बातों में उसने बताया उस समय उसके पिताजी ये दुकान चलाते थे। उनका कुछ साल पहले निधन
हो गया, तब से वही इस दुकान को संभाल रहा है।
मैंने
देखा दूध के साथ उसने दुकान में अब समोसा, लड्डू, बर्फी जैसी चीजें भी रख ली थीं।
मुझे
दुकान के सामान को निहारते देख वो बोला, "कुछ खाएंगे?"
मैंने
एक मुस्कान के साथ उसके सवाल का जवाब नहीं में दिया और उससे विदा लेकर आगे बढ़ा।
कुछ
कदम चलते ही मुझे एक कभी ना भूलने वाला नज़ारा दिखा जो मेरी मेमोरी में बचपन से छपा
है।
सीधे
हाथ पर बचपन वाला साथ-साथ खड़ा श्री कृष्ण मंदिर और गुरुद्वारा श्री गुरु नानक दरबार
मेरे नजरों के सामने था।
अब वो पहले से काफी बदला हुआ लग रहा था पर था वही, मुझे ज़रा भी संदेह नहीं था।
मैं कुछ
पल उन साथ-साथ खड़ी और मेरी यादों में बसी उन दो बेश्कीमती इमरतों को निहारता रहा।
फिर
न जाने मुझे क्या सुझा, मैं उलटे पाँव उस डेयरी शॉप की तरफ चल दिया।
"भाई! एक पाव लड्डू देना" मैं बोला।
अपने
बचपन के मंदिर में प्रसाद चढ़ाने का मौका मैं कैसे छोड़ सकता था।
मैंने प्रसाद लेकर मंदिर में प्रवेश किया। अंदर से भी मंदिर काफी बदल गया था।
बाएँ
हाथ को शिव लिंग था जिसकी सेवा एक सिख भाई कर रहा था।
ऐसा
नज़ारा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। शायद यही खूबसूरती होती है एक छोटे शहर की।
मैंने
शिवलिंग के आगे माथा टेका और मंदिर प्रांगण में नजर दौड़ाई, सामने एक तरफ मन को मोह
लेने वाली आकर्षक राधा कृष्ण की जोड़ी विराजमान थी, उनके बाएँ ओर पवन पुत्र हनुमान
थे और दाहिने तरफ गणेश जी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।
मैंने
मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और परिसर में दीवार के एक खास छोटे से खुले हिस्से को ढूंढने
लगा जो मंदिर को गुरुद्वारे से अंदर से जोड़ता था।
पर
इतने सालों में मंदिर के नवीनीकरण में शायद दीवार का वो छोटा सा आने-जाने वाला हिस्सा
बंद हो गया था। मैं मंदिर से बाहर आया और भगवान पर चढ़ाया हुआ प्रसाद गरीबों में बांट
दिया।
फिर
मैंने बगल से गुरुद्वारे में प्रवेश किया। गुरुद्वारा भी पहले से काफी बदल गया था।
मैंने अंदर जाकर माथा टेका और एक तरफ ध्यान लगाकर बैठ गया।
मन
ही मन ऊपर वाले का धन्यवाद कर रहा था कि सालों बाद दोबारा अपने शहर में आने का मौका
दिया।
आज
का दिन मेरे पिताजी का जन्मदिन भी होता है तो उनको भी याद किया और मन ही मन उनको बोला
कि आज आप मेरी नजरों से अपनी कर्मभूमि को देखें जहाँ काफी समय तक आपने काम किया। मैंने
सोचा ये मेरी तरफ से उनको एक छोटा सा जन्मदिन का तोहफा होगा।
मैंने आंखें खोली तो एक तरफ तीन सिख भाइयों को बैठा देखा जो आपस में बात कर रहे थे, तो उनके पास जाने से खुद को रोक न पाया।
अपने शहर में किसी अनजान इंसान से बात करने की अजीब
सी तलब महसूस कर रहा था मैं। जो आम तौर पर दिल्ली में नहीं होती है।
मैं उनके पास गया, उनको अपना परिचय दिया और झाँसी आने का कारण बताया तो वे तीनों भी आश्चर्य से मेरा मुँह देखने लगे।
काफी देर तक उनसे पुराने समय की और लोगों की बातें होती रही। दिल को बहुत अच्छा सा महसूस हो रहा था।
वे यहीं इसी मोहल्ले में पैदा हुए थे, तो सबको जानते थे। बातों
बातों में उन्होंने बताया कि आप बहुत शुभ दिन आए हैं आज बाबाजी (गुरु नानक देव जी)
का विवाह है। शाम को गुरुद्वारे में पाठ है और सारे मोहल्ले वाले आएंगे, तो आप भी आइए ,
सबसे मिलना हो जाएगा।
मैंने
उनका दिल रखने के लिए हामी भरी और उनसे विदा लेकर गुरुद्वारे से बाहर आ गया।
बाहर आकर कुछ कदम ही चला होऊंगा, तो उल्टे हाथ को एक परचून की दुकान दिखाई दी, जिसे देखकर वही नॉस्टाल्जिया वाली फीलिंग आई।
यह वही दुकान थी जहाँ से माँ घर का राशन लेती थी।
कई बार मैं भी सामान के थैले पकड़ने उनके साथ आता था।
दुकान अब भी बिलकुल वैसे ही थी। इतने सालों के बाद भी उसमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया था।
मैं दुकान के पास जाकर एक कोने में खड़ा हो गया और खरीददारों के जाने का इंतजार करने लगा।
उन कुछ पलों के इंतजार ने मुझे पुराने समय को दोबारा जीने का मौका दिया। ऐसा लग रहा था मानो मैं माँ के साथ उंगली पकड़ कर राशन लेने उस दुकान पर आया हूँ।
दुकान
वाले ने मुझे देख लिया था।
कुछ
देर बाद उसने मेरी तरफ मुखातिब होकर पूछा, "क्या चाहिए आपको?"
मैंने इशारे से उसको बोला कि आप ग्राहक निपटा लो
फिर बात करता हूँ।
उसके
फ्री होने के बाद, करीब दस मिनट उससे बात की तो इतने पुराने ग्राहक को सामने पाकर उसके
चेहरे पर भी आश्चर्य भरी मुस्कान थी।
वो
बोला, "पापा आते होंगे मिल कर जाईएगा।"
मैंने समय कम होने का हवाला देकर उससे विदा ली।
अब
मैं अपने बचपन के मोहल्ले की गली के एकदम मोहाने पर खड़ा था।
गली
अब पक्की हो गई थी, दोनों तरफ बने मकान बदल गए थे।
मैंने
धीरे-धीरे गली में बढ़ना शुरू किया और साथ ही बाएं और दाएं बने मकानों से जुड़ी छोटी
बड़ी यादों को याद करने की कोशिश करने लगा।
सीधे
हाथ को मुड़कर एक घर के सामने आकर रुक गया।
मन
ही मन सोचा अगर मेरी याददाश्त साथ दे रही है तो ये गोल्डी का घर ही होगा।
गोल्डी
मेरा बचपन का दोस्त था।
इस
सोलो नॉस्टैल्जिक ट्रिप पर मैं पहले ही काफी डेरिंग हो चुका था, इसलिए मैंने दरवाजा
खटखटा दिया।
अंदर
से किसी औरत की आवाज़ आई, "कौन है?"
मैंने
दरवाज़े को थोड़ा सा धक्का दिया तो वो खुल गया।
अंदर,
थोड़ी दूरी पर, एक औरत बैठी सब्ज़ी काट रही थी।
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो।
मुझे इसमें मज़ा आने लगा और मैं मन ही मन मुस्कुरा
रहा था।
"वो... गोल्डी का घर यही है?" मैंने उनसे थोड़ी ऊँची आवाज़ में पूछा।
मेरे
सवाल पर वो एक सेकंड के लिए हिचकिचाईं, फिर काम छोड़ कर, गेट पर आ गई।
"आप
कौन?" उन्होंने पूछा।
"जी
मैं…" मैंने फिर संक्षेप में अपनी कहानी सुना दी।
वो
किस्मत से गोल्डी की पत्नी ही थी।
उन्होंने
मुझे बड़े आदर से अंदर बुलाया और ड्राइंग रूम में बैठाया।
पानी
सर्व किया और बोलीं, "ये बाथरूम में हैं, मैं उनको बुला कर आती हूँ, आप बैठिए।"
वो
घर अंदर से किसी आम घर जैसा ही था। बहुत कुछ नहीं बदला था पर नए ज़माने की तब्दीलियाँ
साफ झलक रही थीं।
इतने
में गोल्डी की मम्मी आ गईं। उनके बूढ़े हो चुके चेहरे पर उत्साह से भरी मुस्कान साफ़
देख सकता था मैं। उनकी आंखें खुशी से जैसे चमक रही हों।
"रचित…तुम
रचित हो ना। सरोज का बेटा?" गोल्डी की वाइफ ने शायद उनको मेरा परिचय दे दिया था।
"जी
आंटीजी!" मैं मुस्कुराते हुए बोला और उठ कर उनके पैर छू लिए तो उन बूढ़ी हड्डियों ने
मुझे प्यार से गले लगा लिया।
ये
वही हाथ थे जिन्होंने बचपन में मुझे अपनी गोद में खिलाया होगा।
"अभी
तुम लोगों की बात ही हो रही थी दो तीन दिन पहले की कितना बढ़िया टाइम था वो…." फिर
अगले कुछ मिनट आंटी और मैं दोनों पुराने टाइम में चले गए।
कुछ
देर बाद एक ओवरवेट सरदार तेज कदमों से कमरे में आया। यह गोल्डी था। उसकी शक्ल से पहचान
लिया उसको मैंने। वजन और उम्र के अलावा उसकी शक्ल बदली नहीं थी।
"गोल्डी,
तू कितना मोटा हो गया है!" मुझे अपार खुशी हो रही थी, बचपन के दोस्त से इतने सालों
बाद मिलकर।
"ओये
रचित! कैसा है तू?" वह आया और मुझसे गर्मजोशी के साथ गले मिला। वह भी मुझे देखकर जाहिर
तौर पर बहुत खुश था।
अगला एक घंटा कैसे निकल गया मुझे पता ही नहीं चला। गोल्डी, उसकी मम्मी और उसकी पत्नी जो थोड़ी देर में चाय और स्नैक्स ले कर आ गई थी, हम सबने बैठ कर ढेर सारी पुरानी बातें की और एक-दूसरे का हाल-चाल जाना।
गोल्डी बीच-बीच में अपनी पत्नी को पुराने मज़ेदार किस्से बता रहा था, जिन्हें सुनकर वह बहुत हंस रही थी। मेरा मन तो उनके साथ और बैठने का था, पर समय मेरे पास सीमित था तो उनके लंच के निमंत्रण को शालीनता से मना करके मैं आगे बढ़ गया।
अब मैं अगले बाएं हाथ को मुड़ कर कुछ कदम चलकर वहाँ पहुँचा जहाँ मेरा घर था।
पर ये क्या!
वहाँ तो एक नया मकान बन हुआ था। पुराने घर का नामोनिशान
नहीं था।
मेरा
मन बहुत खराब हुआ। सारा ट्रिप का एक्साइटमेंट जैसे एक पल में खत्म हो गया।
मन को समझा कर मैं भारी कदमों से अंदर घुसा तो एक जाना-पहचाना लेकिन बूढ़ा हो चुका चेहरा दिखा।ये बीरजी मेरे मकान मालिक थे।
"आओ
रचित… कैसे हो? जब गए थे तो छोटे से थे अब देखो कितने बड़े हो गए हो। बहुत खुशी हुई
इतने सालों बाद तुम्हें देखकर।" बीरजी, हमेशा से बहुत मिलनसार और खुशमिज़ाज इंसान थे।
मेरे मकान मालिक तक मेरी आने की खबर पहले ही पहुँच चुकी थी।
उन्होंने
मुझे आते ही गले लगा लिया। मेरा मन जो चंद पलों पहले उदास सा हो गया था वो फिर से खुशहाल
हो गया।
बीरजी
मुझे घर के अंदर ले गए और अपनी पत्नी, मेरी आंटी से मिलवाया।
वो
पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थी और बिस्तर पर थी। मेरा परिचय पाकर उनके चेहरे पर
भी खुशी आ गई। काफी देर तक सबके बारे में पूछा और अपना हाल बताया।
उनको
मिलवाकर बीरजी मुझे अपनी माँ, मेरी बड़ी आंटी से मिलवाने दूसरे कमरे में ले गए।
वह काफी बुढ़ी हो चुकी थी और बिस्तर पर थी। उम्र काफी हो गई थी और सुनती भी उँचा थी।
बीरजी ने ज़ोर से कहा, "बीजी ये रचित है… सरोज का
बेटा। मिलने आया है।"
बीजी
के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई और उन्होंने कांपते हाथों से मेरे सिर पर हाथ रखकर
आशीर्वाद दिया। उनके मुँह से निकले शब्द तो अब मुझे समझ नहीं आ रहे थे पर मैं भाव में
भलीभांति समझ रहा था।
उनको
मिलवाकर बीरजी मुझे लिविंग रूम में ले आए और मेड को चाय नाश्ता लाने के लिए कहा।
मैंने
तुरंत ही पूछा, "बीरजी… ये घर तो बिल्कुल बदल गया है? मैं तो पुराने घर को ढूंढ रहा
था।"
"हाँ
बेटा, समय के साथ बदलाव तो जरूरी है।" उनकी बात के पीछे का भाव मैं समझ गया था।
मुझे
याद था वो दो भाई थे और समय और कलयुग की मार ने इन्हे भी नहीं छोड़ा था।
बाहर
से अंदर आते हुए मैंने घर के दूसरे हिस्से में काम होता देखा था।
बातें करते हुए कुछ ही देर हुई होगी की अचानक घर का मुख्य दरवाज़ा खुला और बीरजी का छोटा भाई काके
अंदर दाखिल हुआ।
"अरे
मेरा शेर बच्चा कितना बड़ा हो गया है।" काके भैया ने आते हुए कहा और दौड़कर मुझे गले
लगा लिया।
ठीक उसी पल , बचपन के उस समय के मोहल्ले के बच्चों के रोल मॉडल ओ. पी. भैया भी आ गए।
उनको
भी मोहल्ले में किसी ने खबर दे दी थी मेरे आने की।
वो
आज भी वैसे ही दिखते थे जैसे आज से 40 साल पहले दिखते थे और मिज़ाज में वैसे ही
कोमलता थी जैसी उस समय थी।
उनकी आँखों में मुझे देख कर आँसू छलक आए थे और उन्होंने
भी मुझे जोर से गले लगा लिया।
सबसे
मिलकर ऐसा लग रहा था मानो मैं फिर से वो 10 साल का बच्चा बन गया हूँ और वो सब मुझे
वैसे ही स्नेह और प्यार से ट्रीट कर रहे थे।
मैं
अपने साथ उस समय की कुछ पुरानी फोटो साथ ले गया था। उनको देखकर तो सब इतने खुश हुए
कि मैं बयां नहीं कर सकता।
पुरानी
नई बातों में और चाय नाश्ते में समय का हिसाब पता नहीं कहाँ पीछे छूट गया। काफी देर
बाद मैंने घड़ी पर नजर डाली तो देखा काफी समय हो गया था।
लंच
के लिए चारों तरफ से घनघोर प्रेशर के बीच में किसी तरह वहां से निकला और मोहल्ले की
गली में आगे बढ़ा।
गली जो बचपन में बड़ी लगती थी अब बहुत छोटी सी लग रही थी।
कुछ
ही सेकंड में मैं गली से निकलकर मेन रोड पर आ गया।
पहला
विचार मन में आया, 'बस… गली खत्म!'
फिर
मन से उस विचार को निकालकर मैं अपने अगले गंतव्य, झाँसी किले की तरफ पैदल ही चल पड़ा।
रानी झाँसी का किला बचपन में एक सपने जैसा लगता था। मैं, हमारे घर की छत से दूर उस किले को घंटों निहारता था और मन ही मन सैकड़ों कहानियां गढ़ लेता था, कि झाँसी की रानी अंग्रेज़ों से ऐसे लड़ी होगी वैसे लड़ी होगी।
पैदल घूमते हुए, मैं झांसी शहर के बदले स्वरूप में मानों पुराने लैंडमार्क और चीज़ें ढूंढ रहा था।
चलते चलते मैं रानी लक्ष्मी बाई पार्क के आगे से गुज़रा जहाँ बचपन में जाया करते थे, तो कदम खुद-ब-खुद उस पार्क की तरफ़ मुड़ गए।
पार्क
में घूमते और पुराने समय को याद करते एक नया और बहुत खास मंज़र देखने को मिला।
पार्क
के एक हिस्से में मेजर ध्यानचंद म्यूज़ियम बन गया था जो कि भारत का पहला और एशिया का
दूसरा समर्पित हॉकी म्यूज़ियम था।
इतनी
प्रभावशाली हस्ती का म्यूज़ियम देखने की लालसा मुझे टिकट काउंटर तक ले आई।
टिकट
लेकर मैं अंदर घुसा तो अंदर का माहौल अलग ही था।
मेजर
ध्यानचंद, जिन्हें हम दद्दा के नाम से जानते थे, उनके जीते हुए तमाम मैडल्स के रिप्लिका
डिस्प्ले पर थे।
सेंटर
में एक बड़ी सी हॉकी और बॉल रखी थी, जिस पर अलग-अलग स्पोर्ट्स सेलिब्रिटीज के सिग्नेचर
थे जो यहां आ चुके थे।
इसके
अलावा उनकी लाइफ पर डिजिटल डिस्प्ले, इंटरैक्टिव स्टोरिज और क्विज़ थी।
एक
कोने में मेजर ध्यानचंद नेशनल हॉकी स्टेडियम, नई दिल्ली का रिप्लिका था।
दो-तीन
डिस्प्ले कैबिन्स में दद्दा का कोट, छड़ी, चश्मा, शर्ट, पैंट और दूसरे पर्सनल सामान
थे।
बाहर
आया तो दद्दा की बड़ी सी मूर्ति लगी देखी।
म्यूज़ियम्स
और फोर्ट्स विजिट करना मुझे हमेशा से अच्छा लगता रहा है। वहां जाकर मुझे लगता है मैं
उस इंसान और हिस्ट्री के उस कभी न भूलने वाले हिस्से के करीब आ गया हूँ। मैं वो सब
महसूस कर सकता हूँ।
कुछ
देर वहां समय बिताने के बाद मैं पार्क से बाहर आया तो मुझे रानी महल का साइन बोर्ड
दिखा। तो मैं उस तरफ चल पड़ा।
रानी
महल, रानी झाँसी का व्यक्तिगत निवास हुआ करता था जब अंग्रेज़ों ने विवादित 'डॉक्ट्रिन
ऑफ़ लैप्स' लागू करके उन्हें झाँसी किले से निकालने पर मजबूर कर दिया था तो यही वह
जगह थी जहाँ रानी लक्ष्मी बाई ने 1857 की विद्रोह की अगुवाई करने का फैसला किया।
आज
इसे एएसआई द्वारा एक संग्रहालय के रूप में संरक्षित किया गया है, जिसमें कई 9वीं से
12वीं सदी की खुदाई में पाए गयी कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ हैं, जो ऐतिहासिक क्षेत्रीय स्थलों
जैसे मदनपुर, बरुआ सागर, दुंधई और चांदपुर से निकाली गई हैं।
वहाँ
से निकलते निकलते मुझे भूख लग गई थी तो मैं ई-रिक्शा लेकर दाऊ के समोसे वाली की दुकान
पहुँच गया।
जिन्हें
नहीं पता उनके लिए बता दूँ, दाऊ कोई छोटा-मोटा नाम नहीं है बल्कि झाँसी में दाऊ के
समोसे स्ट्रिट फूड कल्चर का एक स्तंभ है। यह व्यवसाय तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है।
साधारण समोसे जो सिर्फ मीठी और खट्टी चटनी के साथ परोसे जाते हैं, उनके विपरीत, दाऊ के समोसे अपने अनोखे स्थानीय मेल के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी खास डिश है गरमागरम, करारा समोसा, जिसे मसालेदार कढ़ी में डुबोकर परोसा जाता है, जिसमें खुशबूदार हींग का तड़का खास होता है।
इसके
साथ आप रायता समोसा, गुलाब जामुन, ब्रेड पकोड़ा, रसिली गुजिया, मिर्ची वड़ा ले सकते
हैं। सब कुछ सिर्फ 10 से 15 रुपए के बीच में मिलेगा।
पेट
भरने के बाद मैं झांसी किले की तरफ बढ़ गया। गेट पर टिकट लेकर मैं एक छोटे से बच्चे
की तरह पूरी उत्सुकता के साथ अंदर चल पड़ा ।
बचपन
में मैंने अपने घर की छत से सैकड़ों बार इस किले को देखा होगा और न जाने कौन-कौन सी
कहानियां बनाई होंगी। आज मैंने सोचा कि किले की सबसे ऊंची जगह से झाँसी शहर को देखुंगा।
वैसे
तो झांसी किले को सब जानते हैं पर फिर भी मैं यहाँ बताना चाहूँगा ये वह ऐतिहासिक किला
है जो 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र था।
जब
अंग्रेज़ों ने किले को घेर लिया तो रानी लक्ष्मी बाई अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांध
कर इसी किले की दीवार से घोड़े सहित कूदी थी।
इसी
किले में एक कड़क बिजली नाम की तोप है जो अपने उस वक्त की भयंकर गरज और मारक क्षमता के
लिए प्रसिद्ध है। कहते हैं जब इस तोप से गोला दागा जाता था तो बिजली कड़कने या शेर
की दहाड़ जैसी आवाज़ निकलती थी।
करीब
1 घंटे तक किले में घूमने के बाद अब पूरे दिन पैदल चलने से मेरे पैर दुखने लगे थे।
मेरी डिजिटल वॉच कब की 10,000 स्टेप्स का इंडिकेटर दिखा चुकी थी।
शाम
होने को थी और मैं थक चुका था तो मैंने झाँसी का पहला दिन यहीं समाप्त करने का निर्णय
लिया और ऑटो करके होटल की तरफ चल पड़ा।
जाते जाते मैं एक बार मुड़ कर झाँसी क़िले की भव्यता को एक आखिरी बार जी भर के निहारने से खुद को रोक ना सका।
⧫⧫⧫
आज मेरी सोलो ट्रिप का दूसरा दिन था।
सुबह उठते ही दिल में एक अजीब सी खुशी थी क्योंकि आज का दिन बहुत खास था। आज मैं अपने स्कूल जा रहा था।
वो
स्कूल जिससे जाने कितनी ही बचपन की खूबसूरत यादें जुड़ी हुई थीं। मन में एक्साइटमेंट
थी कि पता नहीं 40 साल बाद, मेरा स्कूल वैसा ही होगा या बदल गया होगा? मैं अपने स्कूल
को पहचान तो पाऊंगा? उसकी जो छवि मेरे अंतरमन में सालों से बसी है क्या वो वैसा ही
दिखता होगा आज भी?
इन
सब सवालों के बीच मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर होटल के रेस्टोरेंट में नाश्ता करके बाहर
आ गया। होटल से मेरे स्कूल की दूरी महज एक किलोमीटर ही थी। सोचा तो था कि मैं होटल
से अपने स्कूल तक पैदल ही जाऊंगा लेकिन दिल में एक्साइटमेंट और स्कूल पहुँचने की जल्दी
इतनी थी कि मैंने ऑटो करना बेहतर समझा।
सुबह
के 11 बज रहे थे, ऑटो ने मुश्किल से 5-10 मिनट लिए होंगे स्कूल पहुँचने में, पर पूरे
रास्ते मेरा मन उतावलेपन से भरा जा रहा था कि जल्दी से जल्दी अपने गंतव्य पर पहुँच
जाऊँ।
आखिर
वो घड़ी आ ही गई, जिसका मुझे सुबह से इंतजार था।
इस
जूनियर विंग में मैंने नर्सरी से क्लास 4 तक पढ़ाई की थी।
ऑटो
से उतर के मैं स्कूल के गेट पर पहुँचा तो देखता हूँ अंदर ग्राउंड में तो शामियाना लगा
है, उसमें कुर्सियाँ लगी हैं जिनपर ऑडियंस बैठी है और स्टेज पर कोई कल्चरल प्रोग्राम
चल रहा है।
मैंने
गेट से ही गार्ड को आवाज़ लगाकर अपने पास बुलाया, "गार्ड साब, आज कोई फंक्शन है क्या
स्कूल में?"
"जी
सर!" गार्ड इतना ही बोला।
"वो
मैं इस स्कूल का 40 साल पुराना छात्र हूँ और दिल्ली से अपना स्कूल देखने आया हूँ।" मैं अपनी एक्साइटमेंट रोक नहीं पा रहा था।
"अच्छा
सर…पर अभी तो संभव नहीं होगा क्योंकि फंक्शन चल रहा है और प्रिंसिपल और सारे टीचर्स
उसी में बिजी हैं।" गार्ड ने मेरी एक्साइटमेंट के गुब्बारे को मानो पिन लगाकर पंक्चर
कर दिया था।
"अच्छा…
कितना टाइम चलेगा ये प्रोग्राम?" मुझे कुछ सुझ नहीं रहा था।
"पता
नहीं सर।" गार्ड ने दो शब्द बोले और मेरा मुंह देखने लगा।
"तो
मैं थोड़ी देर में आऊँ सीनियर विंग में होकर?" मैंने उससे पूछा।
"ठीक
है सर।" कह कर गार्ड अपनी कुर्सी पर जा कर बैठ गया और दूर से प्रोग्राम का मज़ा लेने
लगा।
मैं
भारी मन से आगे बढ़ा तो कुछ कदम चलने पर बाएँ हाथ पर खुले मैदान में एक सफेद रंग की
सिंगल स्टोरी बिल्डिंग देखकर मेरे पैर खुद-ब-खुद ठिठक गए।
ये
मेसोनिक लॉज (जिसे फ्रीमासन्स हॉल भी कहते हैं) की बिल्डिंग थी जहाँ ना जाने कितनी
ही शामें मैंने बचपन में मम्मी पापा के साथ बिताई थीं।
इस
बिल्डिंग का उपयोग दो रूपों में होता है। एक इसमें फ्रीमासन्स सोसाइटी की मीटिंग होती
है और दूसरा इसे कमर्शियल एक्टिविटीज़ के लिए भी दिया जाता है।
मेरे
पापा उस वक्त लायंस क्लब के प्रेसिडेंट और फ्रिमेसन्स सोसाइटी के मेम्बर हुआ करते थे।
इस जगह लायंस क्लब की मीटिंग और फैमिली गेट-टुगेदर हुआ करती थी और बंद दरवाजों के पीछे
फ्रिमेसन्स सोसाइटी की मीटिंग्स। जिसमें किसी नॉन मेम्बर को जाने की इजाज़त नहीं होती
थी।
मेरा
बाल मन फिर से उत्साह से भर गया। क्यूँ न आज उस हॉल में जाकर देखूँ कि अंदर से वो कैसा
दिखता है।
मैं
तेज़ कदमों से परिसर का मुख्य द्वार खोल कर अंदर घुस गया। अंदर बिल्डिंग के साथ
बाएँ हाथ को कुछ कमरे बने हुए थे।
अब
क्यूँकि बिल्डिंग सामने से तो बंद दिख रही थी तो मैं उन साइड वाले कमरों की तरफ बढ़
चला।
पास
पहुँच कर मैं एक दरवाज़ा खटखटाने ही वाला था कि एक महिला अंदर से बाहर निकली। वो मुझे
देख कर थोड़ा सा सकपकाई। शायद दिन के इस वक्त किसी के आने की उम्मीद उसे कम ही थी।
मैंने
अपना वही रटा रटाया टेप रिकॉर्डर ऑन किया और इस बिल्डिंग के साथ अपना कनेक्शन बताया।
तो वो थोड़ा रिलैक्स हुई और उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने मुझे पास रखी
एक कुर्सी पर बैठाया और खुद अंदर चली गई।
कुछ ही पलों बाद, एक जवान लड़का बाहर आया। उसके पीछे वही महिला थी जो शायद उस लड़के की मां थी। वो अभी भी मुझे ऐसे देख रही थी जैसे उसे यकीन ही न हो कि कोई इतने सालों बाद इस जगह को देखने के लिए भी आ सकता है।
खैर,
मैंने उस लड़के को जो कि उस महिला का बेटा लग रहा था, सारी बात बताई। वो भी मुस्कुरा
दिया। शायद मेरा उत्साह छुपने नहीं पा रहा था और इन लोगों का मनोरंजन कर रहा था।
जो
भी हो, उस समय तक मैं बिल्कुल बेपरवाह हो चुका था। मुझे मानो हर कीमत पर इस सोलो ट्रिप
को और अपने बचपन के शहर को पूरी तरह से जी लेना था।
"आप
इतनी दूर से सिर्फ इस जगह को देखने आए हैं तो मैं आपको जरूर दिखाऊंगा।" उसने बातों-बातों
में बताया कि वो और उसका परिवार इस जगह के केयरटेकर हैं।
वो
उस आइकोनिक बिल्डिंग के साइड के एक दरवाजे का ताला खोलकर मुझे अंदर ले गया।
बिल्डिंग के अंदर घुसते ही मुझे लगा मैं फिर से
40 साल पहले की दुनिया में पहुँच गया हूँ।
अंदर
सब कुछ वैसे का वैसा था जैसा 4 दशक पहले एक 10 साल के बच्चे ने देखा था।
उस
वक्त की फीलिंग को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मेरी आँखों में खुशी के आँसू
उमड़ पड़े। उस लड़के ने मेरे लिए अंदर के कमरों के दरवाज़े खोल दिए और बोला आप देख
लो।
मैं
एक्साइटमेंट के मारे कुछ बोल नहीं पा रहा था। मैंने बस उससे कुछ पल मुझे वहां अकेला
छोड़ देने की रिक्वेस्ट की तो वो मुस्कुराकर वहाँ से चला गया। शायद वो मेरे मन की स्थिति
मेरे चेहरे से भांप गया था।
उसके
जाने के बाद मैं कुछ पल हॉल में चुपचाप खड़ा रहा। उस वक्त मानो सारी बचपन की वो शामें
मेरी आँखों के सामने घूम गईं जो इस जगह मैंने अपने पेरेंट्स के साथ बिताई थीं।
इसी
हॉल में फैमिली गेटटुगेदर में कितनी ही शामें हमने लकी ड्रॉ और तंबोला खेला था। सामने
स्टेज लगता था और उनके आगे ऑडियंस के लिए चेयर्स अरेंज होती थीं जहाँ पहले लाइयन्स
की मीटिंग्स होती थीं और बाद में फैमिली गेम्स होते थे।
उस हॉल से निकलकर एक बड़ा सा डायनिंग हॉल था जिसमें एक बड़ी सी हॉल की लंबाई के बराबर की टेबल होती थी और दीवार के साथ लगी कुर्सियां होती थीं जिसपर फैमिलियां बैठकर डिनर करती थीं। वह सब आज भी वैसा ही था।
वही टेबल, वही कुर्सियां।
जो
खुशी मुझे यहां मिल रही थी उसको मैं समेट नहीं पा रहा था। और एक छोटे से बच्चे की तरह
उत्साह में यहां-वहां घूम-घूम कर सब देख रहा था।
इस
उत्साह में मुझे एकदम से वो सीक्रट रूम याद आया जहां मीटिंग्स के दौरान किसी का जाना मना
था। मेरे कदम खुद-ब-खुद उस कमरे की तरफ चल पड़े। इस बिल्डिंग में सब पहले जैसा ही था
तो मुझे उस रूम को ढूंढने की भी जरूरत नहीं थी क्योंकि मुझे पता था वो कहां है।
मैं
उस कमरे के बाहर पहुंचा। उस लड़के ने सारे कमरे खोल दिए थे पर इस कमरे का ताला अभी भी लग रहा था।
मैंने पलट कर देखा तो वो लड़का कहीं दिखा नहीं। कुछ पल उस कमरे के बाहर खड़े रहने के बाद मेरे कांपते हाथ उस कमरे के दरवाजे के ताले की तरफ बढ़े।
एक अजीब सा डर लग रहा था मुझे उस वक्त। जैसे ही मेरे हाथ उस कमरे के दरवाजे के ताले पर पड़े, पीछे से उस लड़के की आवाज़ आई, "रुको सर… मैं खोल देता हूँ।"
'क्या सच में मुझे इस कमरे को अंदर से देखने को मिलेगा आज?' मैं उस वक्त मानो खुद से ही पूछ रहा था।
वो लड़का कमरे की चाभी लेके आया, उसने कमरे का ताला खोला, अंदर का भारी पर्दा हटाया और बाईं हाथ पर लगे स्विच बोर्ड में से एक स्विच दबाकर कमरे की लाइट ऑन कर दी।
कमरा
दूधिया रोशनी में नहा गया।
मैं
अभी भी बाहर ही खड़ा था। मानो अभी एकदम से कोई मुझे अंदर आने से रोक देगा और वापस भेज देगा।
"आइए
सर…" लड़के की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
मैं एक पल के लिए ठिठका और फिर दो कदम चलकर कमरे के अंदर प्रवेश कर गया।
अंदर कमरे को देखकर
बिलकुल वैसे ही प्रतीत हुआ जैसे किसी बच्चे को बड़ी मिन्नतों के बाद कोई पसंदीदा चीज़
मिल गई हो।
यह
एक लंबा हॉल नुमा कमरा था जिसमें दूसरी तरफ एक आर्च शेप मे पक्का स्टेज बना था जिसपर पीछे की
दीवार पर दो साटन के पोस्टर टंगे थे।
उनके
आगे दीवार के साथ दोनों तरफ 15-20 कुर्सियां लगी थीं और उनके बीच एक सिंहासन जैसा बड़ी
कुर्सी लगी हुई थी जिसके आगे एक टेबल लगी थी।
स्टेज
से उतरकर बाएँ और दाएँ दीवार के साथ लाइन में कुर्सियां लगी थीं। स्टेज के दाहिने ओर
एक मुंशी की मेज़ लगी थी जिसपर एक टेबल लैंप रखा था और स्टेज के बाएँ तरफ
खड़े होकर बोलने वाला पोडियम रखा था।
हॉल
का फर्श सफेद-काले मार्बल से सजा हुआ था जो उस कमरे को एक अजीब सा आकर्षण दे रहा था।
कमरे की छत पर वही पुराने समय की लाइट्स और पंखे लगे हुए थे।
कुछ देर उस हॉल के अंदर ठहर कर और कुछ फोटो खींच कर मैं बाहर आ गया।
मेरे चेहरे की मुस्कान
मानो किसी मिशन को पूरा कर लेने वाली खुशी दिखा रही थी।
अब
बारी थी बाहर से उस बिल्डिंग की फोटो लेने की और उसके सामने के लॉन को देखने की।
हॉल
के साइड से घूम कर जब मैं उस बिल्डिंग के फ्रंट में आया तो देखा वो लॉन अब उजाड़ मैदान
सा हो चला था।
मैंने
उस केयरटेकर लड़के से पूछा तो बोला कि मैनेजमेंट में कुछ तनातनी चल रही है, इस वजह
से ये लॉन मेंटेन नहीं हो रहा।
उसकी
बात सुनकर मन में एक अजीब सी टीस उठी कि बचपन में जिस हरियाली से भरे, खुशबुदार फूलों
से लदे पेड़-पौधों वाले लॉन में ठंडी हवा का आनंद उठाते थे, आज वही लॉन मानो अपनी हालत
पर रो रहा था।
खैर
उस केयरटेकर और उसके परिवार को धन्यवाद करके मैं बिल्डिंग के परिसर से बाहर मेन रोड
पर आ गया।
जूनियर
विंग स्कूल के ग्राउंड से फंक्शन की आवाज़ लाउडस्पीकर के माध्यम से अभी भी आ रही थी।
मैं
आगे बढ़ा और सीनियर विंग की तरफ चल पड़ा।
आगे
रोड वी शेप में घूम रही थी जिस पर मुड़ कर कुछ कदम चल कर मैंने खुद को सीनियर विंग
की बिल्डिंग के सामने पाया।
वही उसी बिल्डिंग, वही रंग-रोगन!
मानो मेरे लिए समय रुक सा गया हो। मैंने कुछ सेकंड उस
शिक्षा के मंदिर को निहारा फिर जेब से अपना फोन निकाल कर उसकी एक तस्वीर खींच ली।
उस
फोटो को फोन पर निहारा और तेज कदमों से चल कर स्कूल के गेट पर जा पहुंचा। गेट खुला
था और स्कूल के अंदर और बाहर बच्चों के पेरेंट्स खड़े थे। शायद स्कूल की छुट्टी होने
वाली थी।
वहां गेट पर गार्ड बैठा था। मैंने उसके पास जा कर पूरी बात बताई तो वो भी मुस्कुरा दिया और बड़े ही आदर के साथ मुझे अंदर रिसेप्शन के वेटिंग एरिया में ले गया। वहां मुझे बैठा कर बोला, "सर अभी 15 मिनट में स्कूल की छुट्टी हो जाएगी फिर आप सिस्टर टेरेसा से मिल लेना और स्कूल घूमने की परमिशन ले लेना।"
मैं
वहां वेटिंग एरिया, मैं बैठ गया और आते जाते स्कूल के बच्चों को देखने लगा। उनमें मुझे
अपना बचपन नज़र आने लगा।
सब
कुछ तो वही था. वही स्कूल यूनिफॉर्म, वही बचपन... पर मैं बड़ा हो चुका था।
एक पल को मन किया कि कोई जादू हो जाए और मैं इन बच्चों जैसा छोटा हो जाऊं और अपने स्कूल के पल फिर से जी लूं।
पर
शायद यही तो समय की ख़ासियत होती है... ये रुकता नहीं है।
एक जैसा रहता नहीं है... निरंतर चलता रहता है।
खैर,
मैं इन खयालों में डूबा था तभी स्कूल की छुट्टी हो गई और बच्चों का रेला निकला।
जिन बच्चों के पेरेंट्स उन्हें लेने आए थे, वो उनके
साथ जाने लगे। कुछ बच्चे स्कूल में बने साइकिल स्टैंड की तरफ चल दिए और कुछ पैदल ही
स्कूल के गेट से बाहर निकलने लगे।
बच्चों
की भीड़ कम हुई तो मैं उठकर रिसेप्शन की तरफ बढ़ चला।
वहाँ
एक लेडी बैठी थी। मैंने उन्हें अपने वहाँ होने का कारण बताया तो वो झट से रिसेप्शन
के पीछे से निकलकर बाहर आ गई मानो मैंने कोई बहुत इंटरेस्टिंग स्टोरी सुनाई हो।
वो
सच में इंटरेस्टेड लग रही थी। उन्होंने तसल्ली से मेरी बात सुनी और मुझे कुछ पल और
वेट करने को कहकर सिस्टर टेरेसा को इन्फॉर्म करने चली गई।
कुछ
ही मिनटों के इंतजार के बाद सिस्टर टेरेसा मेरे सामने थीं।
वह
एक बढ़ी हुई उम्र की महिला थीं। बालों में उम्र और अनुभव की चांदी साफ दिख रही थी।
लिबास वही क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल की सिस्टर्स या नन वाला हबिट था।
मैंने
उन्हें आदर के साथ नमस्ते कहकर अपने आने का कारण बताया। वह चुपचाप मुझे सुनती रही।
उनके चेहरे पर मुझे सुनते-सुनते धीरे-धीरे एक प्यारी सी मुस्कान फैल गई।
मैंने
अपनी बात पूरी की तो उनके पहले शब्द थे-
"I
can feel your excitement and energy."
कह
कर वह हंस पड़ीं। मेरा शर्मिंदा होना तो लाज़मी था।
"मैं जब अपने शहर और स्कूल जाती हूँ तो बिल्कुल ऐसा ही फ़ील करती हूँ जैसा आप आज कर रहे हैं।"
उसके
बाद उन्होंने मुझसे मेरे काम और परिवार के बारे में पूछा।
फिर
आखिर में उनके शब्द थे, "आप स्कूल में जहाँ जाना चाहते हैं, जा सकते हैं। जहाँ जितनी
देर बैठना चाहते हैं, बैठ सकते हैं, फोटो क्लिक कर सकते हैं। घूम के आइए, अपने बचपन
को दोबारा जी कर आइए मैं आपको यहीं मिलूंगी।"
मेरी
तो खुशी का ठिकाना नहीं था। मन मानो बल्लियाँ उछल रहा था। उस पल में एक छोटा बच्चा
बन गया था।
मैं
तेज कदमों से चल कर स्कूल के उन हिस्सों की तरफ बढ़ चला जो मेरी मेमोरी में छपे हुए
थे।
वो
रैंप, वो म्यूजिक रूम, वो साइकिल स्टैंड, वो ऑडिटोरियम, वो प्ले ग्राउंड।
सब
मानो एक अजीब सी खुशी दे रहे थे मुझे। कुछ बदल चुका था, कुछ जगहों में पुरानी यादों
के कुछ अवशेष अभी भी मौजूद थे।
उन
सब जगहों में कुछ पल रुककर, उन पुराने पलों को याद करके और मेमोरी के लिए कुछ तस्वीरें
खींचकर मैं वापस रिसेप्शन एरिया में आया तो एक जगह देखने की लालसा जागी।
मेरी
वो आखिरी क्लास जिसके बाद मैं झाँसी से हमेशा के लिए रुख़सत हो गया था।
मेरी
क्लास 6 A… वो क्लास रिसेप्शन के बाद कॉरिडोर में पहली ही हुआ करती थी।
मेरे
कदम अपने आप उस दिशा में चल पड़े। वो क्लास वहीं थी। बाहर बोर्ड भी 6 A का ही लगा
था।
यानी 40 सालों बाद भी कोई बदलाव नहीं आया था।
वही रूम, वही क्लास और वही सेक्शन भी।
मैं क्लास में दाखिल हुआ। क्लास खाली थी। टेबल-कुर्सी
बदल गए थे पर क्लास वही थी।
पता नहीं मेरे मन में क्या आया, मैं जाकर एक कुर्सी पर बैठ गया।
इतने
में एक स्टूडेंट क्लास के बाहर से पास हुआ।
मैंने
उसे आवाज़ देकर अंदर बुलाया और मेरी एक फोटो लेने को कहा।
इतने
में सिस्टर टेरेसा हाथों में एक बड़ा सा सुंदर गुलाबों से भरा गुलदस्ता लेकर आ गई।
"फोटो इस बुके के साथ अच्छी आएगी।" वो बोली और मुझे वो प्यारा सा बुके थमा दिया।
उनका
यह दिल को छू लेने वाला भाव मुझे बेहद पसंद आया।
शायद
उन्होंने मेरी आँखों में उभर आए मोती देख लिए थे इसलिए उन्होंने जल्दी से स्टूडेंट को मेरी
अच्छी अच्छी दो-तीन फोटोज़ लेने को बोला।
फोटोज़
खिचवाने के बाद मैं सिस्टर टेरेसा को धन्यवाद करके उनसे विदा लेता हूँ और एक
बार फिर उस क्लास को आखिरी बार देखकर बाहर आ जाता हूँ।
बाहर
स्कूल के गेट पर वही गार्ड, मानो मेरा इंतजार कर रहा था।
मुझे आते देख वो बोला, "सर! मैं आपकी एक दो फोटो यहाँ स्कूल के सेल्फी पॉइंट पर ले लेता हूँ। आपके लिए स्मृति बन जाएगी।"
मैंने
कुछ फोटो उसके कहने पर खिंचवा लिए जो मैंने बाद में देखे, बहुत अच्छे आए थे।
उसको
धन्यवाद करके मैं स्कूल से बाहर आ गया।
अगला
डेस्टिनेशन सदर बाजार था। वहाँ की बचपन की यादें अभी भी दिमाग में ताजा थी।
"भैया,
सदर बाजार वाले बाटा शोरूम पर ले चलो।" मैंने ऑटो वाले को बोला।
अब
पढ़ने वाले सोचेंगे, बाटा शोरूम में ऐसा क्या खास है, वो तो सब जगह एक सा होता है।
नहीं
जनाब! यह बाटा शोरूम मेरे लिए बहुत खास था।
आज
से 40-50 साल पहले नए कपड़े, स्कूल की यूनिफ़ॉर्म, जूते और नई क्लास की किताबों की
शॉपिंग एक त्योहार से कम नहीं होती थी।
उस
वक्त जब स्कूल के टेनिस शूज़ या ब्लैक शूज़ लेने होते थे तो पापा के साथ मैं इसी बाटा
शोरूम में आता था। एक भावनात्मक लगाव हो गया था इस आउटलेट से, जो इतने सालों बाद
भी बरकरार था। उस बाटा शोरूम को मैं बाहर से ही सही, एक बार देख लेना चाहता था।
तो
जी... हम सदर बाजार पहुंचे …और जिस जगह उस वक्त बाटा का शोरूम था, उस जगह से क्रॉस होकर
जैसे ही ऑटो आगे बढ़ने लगा मैंने ऑटो वाले को बोला, "भाई आगे कहां जा रहे हो?"
"साहब वह बाटा शोरूम अब आगे शिफ्ट हो गया है। वो देखिए, वो रहा।" ऑटोवाला बोला और ऑटो को तेजी से नए वाले आउटलेट की तरफ बढ़ा लिया।
मैंने
ऑटो से सिर निकाल कर पुराने आउटलेट की जगह को देखा, जो पीछे निकल रही थी। उस जगह तो
अब कोई रेडीमेड कपड़ों की दुकान आ गई थी।
"ये
लीजिए साहब, बाटा का शोरूम आ गया।" ऑटो वाला ऐसे खुश होते हुए बोला मानो मेरी मुंह
मांगी मुराद पूरी कर दी हो।
मैंने
एक नजर उस नए बाटा शोरूम को देखा।
वो
तो नार्मल सा बाटा शोरूम लग रहा था, जो सब जगह होता है।
मेरा
मूड ऑफ़ हो गया था। उसको सुधारने का एक ही रास्ता था।
"भैया मुझे नारायण चाट भंडार पर छोड़ दो।"
"अभी
लो, साब।" वो बोला और झट से ऑटो घुमा लिया।
ये
‘नारायण चाट भंडार’ भी मेरी बचपन की यादों का एक हिस्सा था।
यहाँ
मैं अपने पेरेंट्स के साथ चाट खाने बहुत आया करता था।
मैं
ऑटो वाले को फ्री करके दुकान में घुसा और सीधे जाकर काउंटर पर बैठे आदमी से बातें करने
लगा।
अपने
40 साल बाद आने वाली कहानी को मैं चिल्ला-चिल्ला कर पूरे शहर को मानो बता देना चाहता
था।
दोपहर
का समय था, दुकान में ज्यादा ग्राहक भी नहीं थे तो काउंटर के पीछे बैठे वो आदमी जो
मुझे इस दुकान का मालिक लग रहा था वो भी बातें करने लगा।
"अरे
वाह! आप इतने सालों बाद सिर्फ अपना शहर देखने आये हैं। कमाल की बात है।" उसके बाद वह
और मैं पुरानी यादों में खो गए। उसने बताया उस वक्त उसके पिताजी दुकान संभालते थे।
फिर
आई पेट पूजा करने की बारी।
वो बोला, "बताइए क्या खाएंगे?"
मैंने कहा, "बचपन याद दिला दीजिये तो मज़ा आ जाए।"
"अरे
कालू! सर के लिए करेला चाट लगाओ, बढ़िया सी। 40 साल बाद दिल्ली से आए हैं हमारी चाट
खाने।" दुकान मालिक ने काउंटर के पीछे बैठे-बैठे दूसरी तरफ आवाज लगाई।
कालू
नाम के शख्स ने दूर काउंटर के पीछे से सिर उठा कर मुझे देखा, मानो मैं कोई कौतुहल का
विषय हूँ।
उनके
लिए जिन्हें नहीं पता करेला चाट क्या होती है मैं बता दूँ, कि शायद ही आपने कहीं और
ये डिश खाई हो।
ये करेले की शेप में पापड़ी होती है, जिसे मटर या दही-चटनी के साथ खाया जाता है।
बचपन में मेरी चाट खाने की शुरुआत इसी डिश से हुई, फिर उसके बाद तो जब भी चाट खाने यहाँ आते, सबसे पहले मैं करेला चाट की ही फ़रमाइश करता था।
कुछ
मिनटों में मेरी पसंदीदा करेला चाट मेरे सामने थी।
सोचा था खाने से पहले उसकी एक फोटो जरूर लूंगा यादगार के लिए, पर उसके मेरे सामने आते ही मैं सब भूल गया और अगले 5 मिनट में बस उस करेला चाट को एन्जॉय करता रहा।
(ये फोटो इंटरनेट
से आप सबके रेफरेंस के लिए निकाल कर डाली है)
हर
बाइट में बचपन की तस्वीर फ्लैश हो रही थी नजरों के सामने।
इससे
पहले मेरी आंखों में बताते हुए फिर से आंसू आए... आगे बढ़ते हैं।
"भाई!
आपका दिल से शुक्रिया जो आपने एक बार फिर इतने सालों बाद बचपन की याद ताज़ा कर दी।" मैंने दुकान मालिक से कहा।
वो
मुझे और दूसरी डिशेज़ भी चखने को बोलता है, पर मेरा तो पेट और मन उस करेला चाट से भर
गया था। फिर भी मैंने उसका दिल रखने के लिए एक प्लेट गोलगप्पे खाए और उसे पेमेंट के
साथ धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया।
सदर
बाजार में चलते चलते मेरी नजरें ‘नवभारत रेस्टोरेंट’ को खोज रही थीं।
नवभारत
रेस्टोरेंट वह रेस्टोरेंट था जहाँ हम डिनर करने या पार्टियाँ अटेंड करने जाते थे।
यही
वह जगह थी जहाँ हमारे झाँसी छोड़ने से पहले पापा के दोस्तों ने हमारी फेयरवेल पार्टी
ऑर्गनाइज की थी।
खैर,
पूछते-पूछते मैं आखिर नवभारत रेस्टोरेंट पहुँच ही गया।
अंदर
जाकर मैंने काउंटर के पीछे बैठे लड़के से पूछा कि रेस्टोरेंट के मालिक हैं क्या?
वो
एक पल को हड़बड़ाया, फिर खुद को संभालते हुए बोला, “जी… वो अंदर रेस्टॉरेंट में बैठे
हैं।”
मैं
अंदर की तरफ बढ़ा तो अंदर रेस्टॉरेंट उस समय खाली था और कोने की एक टेबल पर एक मेरी
उम्र का शख्स बैठा कुछ काम कर रहा था।
"अरे
हां… ये तो हमारे रेस्टॉरेंट की ही पिक्चर हैं।" उसने मुझे इज्जत से बैठाया और लड़के
को कॉफी लाने को कहा। फिर वो बोला उस समय मेरे पापा ये रेस्टॉरेंट देखते थे।
अगले
आधे घंटे हम दोनों अपने-अपने बचपन की यादें साझा करते रहे। कॉफी पीकर और उस रेस्टोरेंट
को, जो अब कई बार नवीकरण के बाद पूरी तरह बदल चुका था, एक नजर भरकर देखकर मैं बाहर
आ गया।
बाहर
निकलते ही मेरी नजर पास में मरक्यूरी ड्रा क्लीनर्स की दुकान पर अटक गई। मैं फिर से
बचपन की यादों में खोने लगा। यहीं से पापा अपने सूट्स ड्राई क्लीन करवाते थे और कई
बार डिलीवरी लेने मुझे साथ लाते था।
मैं
दुकान के अंदर जाने से खुद को रोक नहीं सका। अंदर से दुकान अब भी बिल्कुल वैसी ही थी,
यह देखकर दिल बहुत खुश हुआ। काउंटर पर शायद उस समय कोई कर्मचारी बैठा था तो ज्यादा
बात नहीं हुई और मैंने एक बार और उस दुकान को अंदर से देखकर बाहर आ गया।
अब तक मुझे थकान महसूस होने लगी थी। मैंने ऑटो पकड़ा और उसे होटल की तरफ चलने के लिए बोला और आराम से बैठ गया।
मुझे लगा था आज का दिन यहीं खत्म हो गया।
पर नहीं… पिक्चर अभी बाकी थी मेरे दोस्त।
होटल
पहुंचा, दोपहर के 3 बज रहे थे।
मैं फ्रेश होकर जैसे ही बिस्तर पर लेटा और फोन उठाया,
एक ख्याल मन में आया कि क्यों न मुनीश को कॉल करके देखा जाए।
मुनीश, मेरे बचपन का दोस्त था। एक-दो बार मैसेज में
बात हुई थी पर मिलना नहीं हुआ था 40 साल से। उसको फेसबुक मैसेंजर पर आने से पहले मैसेज
किया था कि मैं झाँसी आ रहा हूँ।
"हाँ मुनीश…कैसा है भाई? मैं झाँसी में हूँ। मिल सकते हैं?" मैंने फोन कॉल कनेक्ट होते ही पूछा।
"रचित
भाई आ गए? मैं 4 बजे तक आता हूँ।" मुनीश ने मेरी लोकेशन पूछ कर बोला।
बातों-बातों
में पता चला वो झाँसी में ही है। "रचित, मैं तो झाँसी में ही हूँ पिछले 10 सालों से।
मिलते हैं… तेरा कल का क्या प्लान है?" रैना ने पूछा।
"कल
मैं ओरछा जाने की सोच रहा
हूँ और रात में मेरी दिल्ली की ट्रेन है।" मैंने उसको बताया।
"परफेक्ट! कल हम मेरी कार में ओरछा जाएंगे और वापसी में मेरे घर लंच और डिनर, फिर रात में मैं तुम्हें स्टेशन ड्रॉप कर दूंगी।"
ये
तो परफेक्ट प्लानिंग हो गई थी। मैंने उसको और मन ही मन ऊपर वाले को धन्यवाद किया कि
इस ट्रिप की आइसिंग ऑफ द केक तो ये था।
4 बजे मुनिश आया।
उसको इतने सालों बाद देखकर दिल बहुत खुश हुआ। दोनों बचपन के दोस्त गर्मजोशी
से गले मिले और फिर शुरू हुआ बचपन की बातों का सिलसिला।
करीब एक घंटे बाद मुनिश कहता है, "रचित! चलो यार तुम्हारे विजिट का जश्न मनाते हैं। आखिर 40 सालों बाद झांसी आए हो।"
डिटेल में न जाते हुए बस इतना समझते हैं मुनीश ने मुझे 8 बजे होटल छोड़ा और दोबारा जल्दी मिलने का वादा करके विदा ली।
इस तरह मेरा झांसी में दूसरा इवेंटफुल दिन पूरा हुआ।
⧫⧫⧫
झाँसी का तीसरा दिन जल्दी शुरू हुआ क्योंकि मुझे रैना के आने से पहले तैयार होना था और चेक आउट भी करना था।
मैं तैयार हुआ और रैना को मैसेज भेजकर अपने लगेज के साथ होटल की लॉबी
में नीचे आ गया।
मैं
रेस्टोरेंट में बैठा और और नाश्ता ऑर्डर किया। नाश्ता आने से ठीक पहले मेरा फोन बज
उठा।
यह
रैना थी।
वो
बोली, "मैं आ गई हूँ और होटल की लॉबी में तेरा इंतजार कर रही हूँ।"
मैंने
उसे रेस्टोरेंट में आने के लिए कहा।
तब
तक वेटर मेरा ऑर्डर लेकर आ गया था।
"ये
क्या! तुमने नाश्ता क्यों ऑर्डर कर दिया? मैं घर में सब बना कर आई हूँ।" वो हाथ मिलाते हुए बोली।
"भूख
लग रही थी यार। कोई नहीं तेरे घर जाकर और खा लूंगा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और अपने
पाइपिंग हॉट पनीर पराठे पर टूट पड़ा।
रैना ने मेरे पराठे शेयर करने के ऑफर को ठुकरा दिया।
वेटर ने भी उसे चाय या कॉफ़ी के लिए पूछा लेकिन उसने ना में सर हिला दिया।
मौके की नज़ाकत को भांपते हुए मैंने
फटाफट नाश्ता खत्म किया, कॉफी पी और होटल का बिल सेटल करके रैना के साथ जल्दी-जल्दी होटल के
बाहर आ गया।
मैंने
अपना लगेज उसकी कार की डिक्की में रखा और हम घर की तरफ चल पड़े।
रास्ते में रैना का मूड थोड़ा ठीक हुआ तो हमने बातें शुरू की।
हम दोनों को ही लग रहा था कि समय कितनी जल्दी गुजर गया। ऐसा लगता है मानो हमारा बचपन कल ही की बात हो।
लगभग
चार किलोमीटर चलने के बाद, रैना की कार मुख्य सड़क से बाएं मुड़कर बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी
के रेज़िडेन्शल कैंपस में घुस गई। शहर की मुख्य सड़क की हलचल के विपरीत यहाँ शांति
थी और कैंपस हरियाली से भरा हुआ था, जिसमें सुव्यवस्थित ढंग से खड़े टावरों में फ्लैट्स
बने हुए थे।
रैना
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में काम करती थी, और यह फ्लैट
उसे उसी पद पर आवंटित हुआ था।
जैसे
ही हमने फ्लैट में प्रवेश किया, रैना के पति और 15 साल के बेटे निकुंज ने मेरा गर्मजोशी
से स्वागत किया।
चूंकि ओरछा के मुख्य मंदिर, श्री राम राजा मंदिर
के कपाट सुबह के दर्शन के लिए 8 बजे से 12:30 बजे तक खुलते हैं, इसलिए रैना ने फटाफट
नाश्ता डाइनिंग टेबल पर लगा दिया।
नाश्ता करके, मैं, रैना और निकुंज उसकी कार में ओरछा
के लिए निकल पड़े।
मैंने
घड़ी देखी, सुबह के 11 बज रहे थे। ओरछा वहां से लगभग 45 मिनट की ड्राइव थी।
इस
बीच, रैना के पति ने किसी को फोन करके हमारे वीआईपी दर्शन का बंदोबस्त कर दिया था।
जैसे
ही हम ओरछा पहुंचे और मंदिर में प्रवेश किया, एक पंडितजी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।
वो
हमें एक साइड डोर से सीधा मंदिर के गर्भगृह में ले गए।
यहां
यह कहना व्यर्थ होगा कि हमारे दर्शन अद्भुत रहे।
फिर हम उसी परिसर में स्थित चतुर्भुज मंदिर गए। वहाँ से, रैना का बेटे निकुंज ने हमें बेतवा नदी के राफ्टिंग प्वाइंट पर ले गया।
हमने
30 मिनट की हल्की और मनोरम व्हाइट वॉटर राफ्टिंग ट्रिप बुक की, जो रॉयल छतरियों के
पास मैंग्रोव के पेड़ों के बीच से होकर गई। यह वाकई में एक यादगार सवारी थी।
इस
समय तक हमें भूख लग गई थी और मैंने सुझाव दिया कि हम ओरछा में ही लंच करें, लेकिन रैना
के पास दूसरा उससे बेहतर प्लान था।
उसने
बताया कि हम स्वादिष्ट लंच के लिए ‘तात्या विलेज फार्म’ जा रहे हैं।
रैना
ने अपने दोस्तों से इस जगह के बारे में बहुत सुना था और आज से बेहतर दिन और कौन सा
हो सकता था उस जगह का भोजन ट्राय करने का।
यह जगह ओरछा से एक घंटे की ड्राइव पर थी।
हम
सबके पेट में चूहे कूद-कूदकर हाथी बन चुके थे। जैसे-तैसे हम गूगल मैप की मदद से अपने
गंतव्य तक पहुँच गए।
वहाँ
पहुँच कर लगा कि ओरछा से यहाँ तक की लंबी ड्राइव पूरी तरह से फायदेमंद थी।
यह
प्रॉपर्टी एक लोकप्रिय फार्म-टू-टेबल रेस्टोरेंट सेटअप पेश करती थी, जो एक खेत के बीचो-बीच
में स्थित थी। चारों तरफ हरियाली से भरी यह एक सुंदर जगह थी।
अगला
एक घंटा पूरी तरह से यादगार और आनंदमय रहा।
क्योंकि
हमने मिट्टी के चुल्हे पर बने, पत्तल पर परोसे गए स्वादिष्ट बुंदेलखंडी व्यंजनों का
भरपूर आनंद लिया।
इस
बुंदेलखंडी थाली में 20-22 अलग अलग प्रकार के व्यंजन शामिल थे, जिनमें मंगोड़ी और चुल्हे
की दाल बाटी भी शामिल थी।
खाने
के अलावा, यह जगह असली गाँव के जीवन का अनुभव भी देती थी, जैसे गौशाला, घुड़सवारी और
बच्चों के लिए झूले।
दोपहर
के 3:30 बजे थे, अब हमें घर लौटना था। यहां से घर तक की ड्राइव करीब 35 मिनट की थी।
घर
पर आराम करते हुए, रैना ने बताया कि उसकी जान-पहचान वाली डॉ. निधि अग्रवाल भी एक लेखिका
हैं और उन्होंने कुछ किताबें लिखी हैं।
बातों-बातों
में उसने उन्हें कॉल कर दिया और मेरे बारे में बता कर फोन मुझे पकड़ा दिया। डॉ. निधि
ने बातचीत में हमें शाम की चाय के लिए घर पर इनवाइट कर लिया।
शाम
7 बजे हम उनके घर पहुंच गए और एक घंटे में उन्होंने और उनके पति डॉ. विक्रम ने हमारी
खूब खातिरदारी की।
मैंने
डॉ. निधि को मेरी राइटिंग जर्नी और किताबों के बारे में बताया, वहीं उन्होंने अपनी
हिंदी राइटिंग मुझसे साझा की। थोड़ा समय उनके साथ बिताने के बाद, मैं और रैना वापस
घर आ गए।
मेरी
वापसी की ट्रेन रात 10 बजे थी, तो मैंने 9 बजे रैना के पति को वीआईपी दर्शन के अरेंजमेंट्स
करने के लिए दिल से धन्यवाद दिया और स्टेशन निकलने को तैयार हुआ।
रैना
और निकुंज मुझे गाड़ी से स्टेशन ड्रॉप करने आए, जहाँ उनको दिल से धन्यवाद देकर मैं स्टेशन
के अंदर की तरफ चल पड़ा।
ट्रेन
अपने तय समय से छूटी और झाँसी का प्लेटफार्म धीरे-धीरे पीछे छूट गया लेकिन 40 साल बाद
अपने जन्मस्थान की यात्रा और 20 साल बाद अकेले यात्रा का कभी न भूलने वाला अनुभव मेरे
साथ था।